क्या आपने कभी बारीकी से ध्यान दिया है कि इंसान बाहर से जितना साधारण दिखता है, अंदर से वह उतना ही जटिल, उलझा हुआ और रहस्यमयी शक्तियों से भरा होता है? हम रोज़ सुबह उठते हैं, काम पर जाते हैं, नए लोगों से मिलते हैं, कभी खुश होते हैं, कभी गहरे तनाव में डूब जाते हैं, तो कभी अचानक भविष्य से डरने लगते हैं—लेकिन शायद ही कभी हम ठंडे दिमाग से यह सोचते हैं कि हमारे जीवन की कमान संभालकर यह सब पीछे से कर कौन रहा है? कोई हमें थोड़ी सी बात कहकर गुस्सा दिला देता है, कोई एक कड़वा शब्द कह देता है और हम पूरी रात सो नहीं पाते। कभी बिना किसी ठोस वजह के भी मन अचानक भारी हो जाता है, तो कभी विपरीत परिस्थितियों में भी भीतर से एक जादुई ऊर्जा महसूस होती है। इसका सीधा जवाब हर बार एक ही होता है—हमारे Dimaag Ki Shakti।
लेकिन हमारे आधुनिक समाज की विडंबना यह है कि हमें स्कूल-कॉलेज में दिमाग का इस्तेमाल करना तो सिखाया गया—सिर्फ पढ़ाई के लिए, नौकरी पाने के लिए या भौतिक काम निपटाने के लिए—पर इस जटिल न्यूरोलॉजिकल सिस्टम को भीतर से समझना हमें कभी नहीं सिखाया गया। इसी बुनियादी वजह से हम कई बार अपनी ही भावनाओं से हार जाते हैं, बिना यह जाने कि हमारे अवचेतन मन में कितनी बड़ी ब्रह्मांडीय ताकत छुपी हुई है। आज ‘Agyatraaz’ के इस गहरे मनोवैज्ञानिक लेख में हम बिना किसी भारी-भरकम वैज्ञानिक परिभाषा के, सीधे आपकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़े रियल-लाइफ उदाहरणों के साथ समझेंगे कि इंसान के Dimaag Ki Shakti के वे 7 गुप्त आयाम कौन से हैं, जिन्हें यदि आपने आज मास्टर कर लिया, तो आपकी ज़िंदगी पूरी तरह से एक नए और सफल मोड़ पर आ जाएगी।
विषय सूची (Table of Contents)
- 1. इंसान का दिमाग असल में बैकग्राउंड में करता क्या है?
- 2. कल्पना शक्ति – जो आपके कल की वास्तविक नींव रखती है
- 3. अवचेतन मन – जो बिना बताए आपके सारे बड़े फैसले लेता है
- 4. आत्म-सुझाव – जो न्यूरोपैथवे के ज़रिए आपकी पहचान बनाता है
- 5. फोकस की शक्ति – न्यूरोप्लास्टिसिटी का असली विज्ञान
- 6. निर्णय लेने की छुपी शक्ति – डर बनाम वास्तविक क्षमता
- 7. भावनात्मक नियंत्रण और आदतों को बदलने का शांत विज्ञान
- 8. FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)
1. इंसान का दिमाग असल में बैकग्राउंड में करता क्या है?
इंसानी मस्तिष्क कोई साधारण हार्डवेयर या सिलिकॉन मशीन नहीं है; यह एक ऐसा अनंत जैविक सुपरकंप्यूटर है जो हर सिंगल सेकंड में हमारे संवेदी अंगों से आने वाली लाखों गुप्त सूचनाओं को प्रोसेस करता है। जब आप इस वक्त ‘Agyatraaz’ के इस पैराग्राफ को पढ़ रहे हैं, तो आपकी आँखें अक्षरों को पहचान रही हैं, आपका विजुअल कॉर्टेक्स सक्रिय है, और आपकी स्मृति पुरानी यादों से इसकी तुलना करके एक गहरी समझ पैदा कर रही है। यह सब आप होशपूर्वक ज़ोर देकर नहीं कर रहे—यह सब आपके मस्तिष्क के भीतर ऑटोमैटिक मोड पर चल रहा है।
आपकी सांसें अपने आप चल रही हैं, दिल की धड़कनें पूरी तरह नियंत्रित हैं, और चलते या साइकिल चलाते समय आप कभी यह नहीं सोचते कि किस पैर पर कितना वजन डालना है। इन बुनियादी शारीरिक क्रियाओं के लिए आपको कोई conscious effort (सक्रिय प्रयास) नहीं करना पड़ता; यह सब आपका केंद्रीय तंत्रिका तंत्र चुपचाप संभालता है। यही सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई है कि जिस मस्तिष्क पर हम कभी ध्यान नहीं देते, वही चुपके से हमारी आदतें, हमारे बड़े जीवन के फैसले, हमारे रिश्ते और हमारा पूरा भविष्य तय कर रहा होता है। इसलिए वास्तविक Dimaag Ki Shakti को पहचानना किसी भी इंसान के आत्म-विकास के सफर का पहला और सबसे अनिवार्य कदम है।
2. कल्पना शक्ति – जो आपके कल की वास्तविक नींव रखती है
कल्पना शक्ति (Imagination) को ज़्यादातर लोग केवल बच्चों के खिलौनों या कहानियों की चीज़ समझकर खारिज कर देते हैं। लेकिन न्यूरोसाइंस के धरातल पर कड़वा सच यह है कि बिना रचनात्मक कल्पना के कोई भी इंसान अपने जीवन के चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल सकता। आज इस भौतिक दुनिया में इंसानों द्वारा निर्मित जो कुछ भी शानदार मौजूद है—चाहे वह आसमान छूती इमारतें हों, सैटेलाइट नेटवर्क हो, मोबाइल तकनीक हो या कोई बहुत बड़ा अंतरराष्ट्रीय बिज़नेस—वह सब हकीकत में आने से पहले किसी न किसी इंसान के मस्तिष्क में केवल एक काल्पनिक विचार के रूप में जन्मा था।
जब आप किसी नए काम या रिस्क को शुरू करने के बारे में सोचते हैं और आपके भीतर सबसे पहले यह नकारात्मक ख्याल आता है कि “मुझसे नहीं होगा”, “मैं बुरी तरह फेल हो जाऊँगा”, या “लोग मेरा मज़ाक उड़ाएंगे”—तो उसी माइक्रोसैकंड में आपका मस्तिष्क खुद को एक गहरे खतरे (Survival Mode) की स्थिति में डाल लेता है। हमारा अमिगडाला (Amygdala) सक्रिय होकर आपको बचाने के लिए सुरक्षात्मक बहाने, काम को टालने की आदत (Procrastination) और आलस्य पैदा करने लगता है। न्यूरोलॉजिकल शोध साबित करते हैं कि हमारा अवचेतन मन किसी वास्तविक भौतिक डर और दिमाग में सोचे गए काल्पनिक डर के बीच अंतर नहीं कर पाता; आप जिस डर को बार-बार विजुअलाइज़ करते हैं, दिमाग उसे आपकी हकीकत मान लेता है। लेकिन जैसे ही आप इस कल्पना को सकारात्मक दिशा देते हैं, आपके मस्तिष्क के न्यूरॉन्स नए रास्ते बनाने लगते हैं जो आपकी सफलता का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
3. अवचेतन मन – जो बिना बताए आपके सारे बड़े फैसले लेता है
अवचेतन मन (Subconscious Mind) हमारे मस्तिष्क का वह अदृश्य और अथाँ महासागर है जो बाहर से शांत दिखता है, लेकिन हमारे जीवन के 95% निर्णयों को पर्दे के पीछे से वही चलाता है। आपको ऊपर से ऐसा भ्रम हो सकता है कि आप अपनी नौकरी, निवेश या रिश्तों के फैसले बहुत सोच-समझकर ले रहे हैं; लेकिन असल में आपके वे सारे त्वरित निर्णय आपके भीतर बचपन से गहरे बैठे पुराने विश्वासों (Core Beliefs) के प्रोग्राम्ड पैटर्न से निकलते हैं।
बचपन के दिनों में माता-पिता, समाज या शिक्षकों द्वारा अनजाने में बोली गई बातें जैसे—”तुम पढ़ाई में बहुत कमज़ोर हो”, “हमारे खानदान के लोग कभी बड़ा व्यापार नहीं करते”, या “पैसा कमाना बहुत ही कड़वा और मुश्किल काम है”—उस समय बहुत छोटी लगती हैं, लेकिन आपका अवचेतन मन उन्हें अकाट्य सत्य के रूप में हमेशा के लिए अपनी फाइलों में लॉक कर लेता है। बड़े होने पर जब भी आपके सामने कोई बड़ा अवसर आता है, तो बैकग्राउंड में छिपी वही पुरानी रिकॉर्डिंग आपके फैसलों को प्रभावित करने लगती है और आप बिना किसी तार्किक कारण के खुद को आगे बढ़ने से रोक लेते हैं। इस विषय की अदृश्य सूक्ष्मताओं और गजब के पैटर्न्स को आप ‘Agyatraaz’ के पिछले विशेष लेख Intuition क्या होता है और छठी इंद्रिय का रहस्य में और अधिक गहराई से समझ सकते हैं, जहाँ अवचेतन मन की यह अद्भुत क्षमता छिपे हुए संकेतों को पलक झपकते ही पकड़ लेती है।
4. आत्म-सुझाव – जो न्यूरोपैथवे के ज़रिए आपकी पहचान बनाता है
एक आम इंसान पूरे दिन में बाहरी लोगों से जितनी बातें नहीं करता, उससे कहीं गुना ज्यादा वह अपने भीतर खुद से (Self-Talk) संवाद करता है। लेकिन ज़्यादातर लोग इस बात के प्रति बिल्कुल अंधे होते हैं कि वे अपने आंतरिक एकांत में खुद को किस प्रकार के आत्म-सुझाव (Autosuggestion) दे रहे हैं। ईमानदारी से अपने अंतर्मन में झाँककर खुद से पूछिए—क्या आप अक्सर किसी गलती पर खुद को कोसते रहते हैं? क्या आप खुद को भीतर ही भीतर कमजोर, बदकिस्मत या हारा हुआ मानते हैं? अगर आपका जवाब अनजाने में भी “हाँ” है, तो समझ लीजिए कि आपकी वास्तविक Dimaag Ki Shakti इसी नकारात्मक सुझाव को सच साबित करने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा रही है।
वैज्ञानिक शोधों के अनुसार, हमारे द्वारा आंतरिक रूप से बोले गए शब्द केवल हवा की लहरें नहीं होते; वे हमारे न्यूरोपैथवे के लिए सीधे और कड़े डिजिटल आदेश होते हैं। जब आप खुद को बार-बार बताते हैं कि आप एक आत्मविश्वासी और बुद्धिमान इंसान हैं, तो आपका फ्रंटल कॉर्टेक्स उसी के अनुरूप आपके व्यवहार और बॉडी लैंग्वेज को ढालना शुरू कर देता है। इसलिए आत्म-सुझाव ही अंततः दुनिया के सामने आपकी असली पहचान तय करता है—चाहे आप इस मानसिक खेल के प्रति जागरूक हों या पूरी तरह बेखबर।
5. फोकस की शक्ति – न्यूरोप्लास्टिसिटी का असली विज्ञान
हमारा मस्तिष्क एक समय में अपनी पूरी ऊर्जा को ब्रह्मांड की हर चीज़ पर एक साथ केंद्रित नहीं कर सकता; इसकी अपनी एक सीमित बैंडविड्थ होती है। आप जीवन के जिस भी पहलू (समस्या या समाधान) पर अपना ध्यान बार-बार और लंबे समय तक केंद्रित करते हैं, आपका मस्तिष्क न्यूरोप्लास्टिसिटी के सिद्धांतों के तहत उसी हिस्से को न्यूरोलॉजिकल रूप से बड़ा और ताकतवर करने लगता है। अगर आप हर समय अपनी आर्थिक तंगी, बीमारियों या लोगों के बुरे व्यवहार के बारे में सोचते रहेंगे, तो आपको पूरी दुनिया में केवल नकारात्मकता ही दिखाई देगी।
लेकिन जैसे ही आप अपना फोकस समाधान, नई स्किल्स सीखने और तरक्की के रास्तों पर शिफ्ट करते हैं, मस्तिष्क का Reticular Activating System (RAS) आपके लिए वातावरण से केवल काम के अवसरों को छानकर आपके सामने लाना शुरू कर देता है। चिकित्सा विज्ञान के आधुनिक दौर में न्यूरोलॉजिस्ट्स ने यह साबित किया है कि नियमित ध्यान (Meditation) के अभ्यास से मस्तिष्क के ग्रे-मैटर की संरचना को भौतिक रूप से बदला जा सकता है। इस विषय पर की गई वैश्विक रिसर्च और इसके न्यूरोलॉजिकल प्रमाणों को आप National Institutes of Health (NIH) की साइंटिफिक रिपोर्ट में विस्तार से देख सकते हैं, जो यह साबित करती है कि ध्यान कैसे सीधे हमारे दिमाग के फोकस और उसकी प्लास्टिक क्षमता को बूस्ट करता है। फोकस जहाँ जाता है, ऊर्जा का बहाव भी वहीं होने लगता है और परिणाम अपने आप सामने आ जाते हैं।
6. निर्णय लेने की छुपी शक्ति – डर बनाम वास्तविक क्षमता
आप आज जीवन के जिस भी मुकाम पर खड़े हैं, चाहे आपका आर्थिक स्तर जैसा भी हो या आपके रिश्ते जैसे भी हों, वह किसी अचानक घटी बाहरी दुर्घटना का नतीजा नहीं है; बल्कि वह आपके अतीत में लिए गए छोटे-बड़े निर्णयों का सीधा परिणाम है। आपके जीवन का रास्ता आगे किस दिशा में मुड़ेगा, यह आपकी हस्तरेखाओं या किस्मत से ज़्यादा इस बात पर निर्भर करता है कि आप संकट या डर के ऐन सामने खड़े होकर क्या चुनते हैं।
कड़वा सच यह है कि एक आम इंसान के ज़्यादातर बड़े फैसले उसकी अंतरात्मा की स्वतंत्र आवाज़ से नहीं, बल्कि “असफल होने के गहरे डर” से पैदा होते हैं—लोग क्या कहेंगे, समाज थू-थू करेगा तो क्या होगा, या अगर कोशिश करने के बाद भी हार गए तो खुद को कैसे संभालेंगे? यही आदिम डर हमें हमेशा एक सुरक्षित और आरामदायक दिखने वाले रास्ते (Comfort Zone) पर ढकेल देता है, जहाँ हमारी असली क्षमता और Dimaag Ki Shakti घुट-घुट कर दम तोड़ देती है। लोग डर के मारे मनपसंद करियर नहीं चुनते, डर के मारे खराब रिश्तों का बोझ ढोते रहते हैं, और डर के मारे कभी अपने हक की बात नहीं कह पाते। जिस दिन आप अपने इस अचेतन डर को पहचानकर उसके पार जाकर फैसले लेना शुरू करते हैं, उसी दिन से आपकी वास्तविक आंतरिक क्षमता जाग्रत होने लगती है।
7. भावनात्मक नियंत्रण और आदतों को बदलने का शांत विज्ञान
भावनाएँ (Emotions) ही इंसान को मशीन से अलग बनाती हैं, लेकिन जब आप अपनी ही तीव्र भावनाओं के आवेग में बिना सोचे-समझे बहने लगते हैं, तो वह आपके विनाश का कारण बन जाता है। गुस्से के एक अनियंत्रित क्षण में बोला गया शब्द, गहरे डिप्रेशन में आकर छोड़ा गया कोई सुनहरा मौका, या केवल जल्दबाज़ी में किसी धोखेबाज़ पर किया गया भरोसा—ये सब भावनात्मक नियंत्रण की कमी के कारण होते हैं। न्यूरोलॉजी के अनुसार, जब हमारा दिमाग तनाव में होता है, तो उसका सीधा असर हमारी नींद और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। इस विषय की गहरी कड़ियों को समझने के लिए आप ‘Agyatraaz’ की हमारी विशेष गाइड रात के 3 बजे अचानक नींद खुलने का वैज्ञानिक व आध्यात्मिक कारण भी पढ़ सकते हैं, जहाँ तनाव और मस्तिष्क के आपसी संबंधों को बहुत ही गहराई से डिकोड किया गया है।
इसी तरह हमारी आदतें (Habits) कभी भी रातों-रात न तो बनती हैं और न ही अचानक जादू से खत्म होती हैं; वे हमारे मस्तिष्क के बेसल गैन्ग्लिया में धीरे-धीरे एक ‘लूप’ के रूप में स्थापित होती हैं। अच्छी बात यह है कि न्यूरोप्लास्टिसिटी के कारण हमारा दिमाग कभी भी पूरी तरह स्थिर या फिक्स नहीं होता; इसमें ताउम्र नए रास्ते और नए न्यूरोलॉजिकल कनेक्शंस बनाने की अद्भुत क्षमता होती है। जब आप अपनी छोटी-छोटी रोज़मर्रा की आदतों को सचेत होकर लगातार 21 से 90 दिनों तक दोहराते हैं, तो मस्तिष्क का पुराना ढर्रा टूट जाता है और नया व्यवहार पूरी तरह ऑटोमैटिक मोड पर आ जाता है। याद रखें, आप रोज़ाना जो छोटे-छोटे काम अनजाने में करते हैं, लंबे समय में आप वही इंसान बन जाते हैं।
जब दिमाग की शक्ति डर और वहम बन जाती है
अगर कोई इंसान अपने मस्तिष्क के इन जटिल और जादुई नियमों के प्रति सचेत नहीं होता, तो वही अद्भुत Dimaag Ki Shakti उसके खिलाफ काम करते हुए गहरे मतिभ्रम, वहम, काल्पनिक भय और अंधविश्वास की डरावनी दुनिया रच देती है। जब इंसान का सबकॉन्शियस माइंड अत्यधिक तनाव या बचपन के ट्रामा के कारण ब्लॉक हो जाता है, तो वह बाहर की सामान्य घटनाओं में भी पैरानॉर्मल साये और अदृश्य खतरे देखने लगता है। इसी विषय के पीछे छिपे गहरे न्यूरोलॉजिकल और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सच को जानने के लिए आप हमारा बेहद लोकप्रिय लेख भूत होते हैं या नहीं? विज्ञान और मनोविज्ञान का असली सच ज़रूर पढ़ सकते हैं, जो अंधविश्वास के पर्दे को ज्ञान के प्रकाश से पूरी तरह हटा देता है।
निष्कर्ष – आपकी सबसे बड़ी ताकत आप ही हैं
इंसान का मस्तिष्क उसकी ज़िंदगी का सबसे बेहतरीन और वफ़ादार गुलाम बन सकता है, बशर्ते वह उसे सही आदेश देना सीख जाए; वरना अनजाने में यही मस्तिष्क आपका सबसे क्रूर और जानलेवा मालिक बन जाता है। जिस दिन आप अपने अचेतन डर, रोज़ की अनियंत्रित सोच और अपनी पुरानी आदतों को एक साक्षी भाव से देखना और समझना शुरू कर देते हैं, उसी पल से आपके जीवन में एक बहुत बड़े और सकारात्मक रूपांतरण की नींव रख दी जाती है। याद रखें कि कोई भी वास्तविक और स्थायी बदलाव बाहर की दुनिया या परिस्थितियों को बदलने से नहीं आता; वह हमेशा आपके भीतर के न्यूरॉन्स और विचारों के बदलने से शुरू होता है। जब आपका आंतरिक संसार बदलता है, तो आपकी बाहरी भौतिक ज़िंदगी अपने आप एक खूबसूरत और सफल दिशा अख्तियार कर लेती है।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)
Q1. न्यूरोप्लास्टिसिटी (Neuroplasticity) क्या होती है और यह आदतों से कैसे जुड़ी है?
जवाब: न्यूरोप्लास्टिसिटी हमारे मस्तिष्क की वह अद्भुत भौतिक क्षमता है जिसके तहत वह नए अनुभवों, विचारों और आदतों के आधार पर अपने न्यूरोलॉजिकल कनेक्शंस को दोबारा री-वायर (बदल) कर सकता है। इसी वैज्ञानिक सच्चाई के कारण इंसान अपनी उम्र के किसी भी पड़ाव पर अपनी पुरानी और खराब आदतों को बदलकर नई आदतें सीख सकता है।
Q2. क्या आत्म-सुझाव (Autosuggestion) से डिप्रेशन या एंग्जायटी को कम किया जा सकता है?
जवाब: हाँ, क्लीनिकल साइकोलॉजी में इसे कॉग्निटिव रीस्ट्रक्चरिंग कहा जाता है। जब आप होशपूर्वक अपने भीतर चलने वाली नकारात्मक सेल्फ-टॉक को रोककर खुद को सकारात्मक और तार्किक रूप से सही आत्म-सुझाव देना शुरू करते हैं, तो मस्तिष्क में कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर गिरता है और डोपामाइन व सेरोटोनिन जैसे हैप्पी हार्मोन्स का स्राव बढ़ता है, जो मन को शांत करता है।
Q3. हम अपने अवचेतन मन (Subconscious Mind) को री-प्रोग्राम कैसे कर सकते हैं?
जवाब: अवचेतन मन को री-प्रोग्राम करने के दो सबसे बेहतरीन समय होते हैं—रात को सोने से ठीक 10 मिनट पहले और सुबह सोकर उठने के ठीक 10 मिनट बाद। इस समय हमारा मस्तिष्क अल्फा वेव्स की स्थिति में होता है, जहाँ दिया गया कोई भी आत्म-सुझाव या लक्ष्य सीधे अवचेतन मन की गहराइयों में जाकर बैठ जाता है और लोग वास्तविक Dimaag Ki Shakti का लाभ उठा पाते हैं।
✍️ Author Mukesh Kalo की राय
“एक प्रोफेशनल कंटेंट राइटर और गहरे इंसानी व्यवहार के शोधकर्ता होने के नाते, मेरा यह पक्का मानना है कि इंसान की असली नियति उसके हाथों की लकीरों में नहीं, बल्कि उसके खोपड़ी के भीतर चल रहे विचारों के न्यूरोपैथवे में छिपी हुई है। हम अक्सर दुनिया को जीतने की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन कड़वा सच यही है कि जो इंसान अपने ही मन के भटकाव, अपने डर और अपने अवचेतन मन की पुरानी प्रोग्रामिंग को नहीं जीत सका, वह पूरी दुनिया जीत कर भी हमेशा अंदर से हारा हुआ और अधूरा ही महसूस करेगा। आइंस्टीन से लेकर हमारे प्राचीन ऋषियों-मुनियों ने भी हमेशा इसी आंतरिक चेतना को जगाने की बात की है। अपने मस्तिष्क को एक क्रूर मालिक मत बनने दीजिए, इसे अपना सबसे आज्ञाकारी सेवक बनाइए, क्योंकि यही वो इकलौती जादुई चाबी है जो आपके जीवन के हर बंद ताले को एक झटके में खोल सकती है।”
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दोस्तों, क्या आपने भी कभी महसूस किया है कि जब आपने किसी काम को पूरी शिद्दत से करने का केवल पक्का मन बना लिया, तो रास्ते अपने आप खुलते चले गए?
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